
सुरुचि एक स्थान पर खड़ी हो जाती है वो पुजारी जी को भी पहचान लेती है ये पुजारी वीर सिंह के कुल पुजारी थे ये ही इनकी कुलदेवी की उपासना और धार्मिक कार्य करते थे
वो सुरुचि को देखते हुए थोड़ा सा ठिठक गए और सुरुचि को देखकर बोले शायद तुम्हें कहीं देखा था कहीं
क्या तुम कुछ जानी पहचानी सी नहीं लगती
सुरुचि कुछ नहीं कहती और पुजारी जी को चरण स्पर्श करके वहां से जाने लगती है तभी गीता वहां आ जाती है और कहती है कि तुम यहाँ हो और भाभी तुम्हें खोज रहीं हैं अभी पूजा शुरू नहीं हुई तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए ये तो ठाकुरों की कुलदेवी है तुम्हें इनके दर्शन उधर से करने चाहिए
सुरुचि कहती हैं कि मैं कुछ जानती नहीं भूल से यहां चली आई माफी चाहती हूं
गीता कहती हैं कि अभी वीर सिंह की माता जी देख लेंगी तो तुम्हें खरी खोती सुना देंगी सब देख क्या रहीं हो निकलो अब जल्दी से
तुम्हारे कारण मुझे भी चार बाते सुननी पड़ेंगी क्रमशः
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