
सुरुचि कहती हैं कि चलो यहां से
और सुरुचि गीता के साथ चली जाती है तो वो एक रास्ता देखती है जो बंद होता है मंदिर के एक दम अलग होकर जाता है वहां पर झाड़ी और बड़े बड़े पेंड लगे हुए हैं सुरुचि वो रास्ता पहचान लेती है
गीता सुरुचि से कहती है कि तुम आओ
भाभी के पास काम है मैं वहां जाती हू मंदिर मत जाना अभी
ये तुम्हारा नहीं है तुम कुलदेवी के सामने नहीं जा सकती ये ठाकुर के खानदान की कुलदेवी हैं
ठाकुरों की बहुएं और बेटियाँ ही यहा आ सकती है अब यहा आने की भूल मत करना समझी
और गीता वहां से चली जाती है
अब सुरुचि उसी रास्ते की तरफ बढ़ जाती है जहां से कभी वो कुलदेवी के मन्दिर आई थी वो रास्ता जाना पहचाना सा था लेकिन अब वो बंद हो चुका था क्रमशः
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