देव दासी भाग 577

यादों की एक रील सी उसकी आँखों के सामने घूमने लगती है और सुरुचि मार्ग खोजने लगती है जहां से वह आई थी वो उसी ओर जाने लगती है

चलती जाती है चलती जाती है बहुत सारे पेड़ों के बीच से वह जाती है

आगे जाने पर वह देखती है कि पेंड कटे हुए थे रास्ता भी साफ था वह अब आगे की ओर बढ़ती है जितना जितना वह आगे बढ़ती है उतना ही उसे सबकुछ याद आने लगता है

वह शिव जी के मंदिर के पास जाती है वहां पर एक झरना भी बह रहा था निर्मल जल बिल्कुल निर्मल जल

सुरुचि झरने को देखकर बहुत ही खुश होती है उसे लगता है कि शायद ये झरना उसके लिए ही बह रहा है

सुरुचि शिव जी के मंदिर जाने से पहले झरने में स्नान करना चाहती है और वो अपने लंबे बालों को खोलती है और झरने में स्नान करती है

तभी उसे याद आने लगता है कि वो प्यार

वो बहार भले ही चार दिन की थी लेकिन सचमुच वो दिन कितने अच्छे थे क्रमशः

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें