
सुरुचि अपने उन्हीं पिछले दिनों में खो जाती हैं और वीर सिंह की यादों मे
कितने मीठे थे वो पल
कितना प्यार किया था वीर सिंह ने और वो उसी पुरानी हवेली की तरफ बढ़ चलती है जहां उसने वीर सिंह के साथ कुछ पल गुजारे थे
शायद वो पल उसकी जिन्दगी के आखिरी सुखद पल थे
आगे बढ़ती है तो देखती है कि हवेली का दरवाजा कुछ खुला सा था
चारो ओर धूल और गंदगी
मकड़ी के जाल लगे हुए थे
चारो तरफ छोटे छोटे पेंड और झाड़ी उगी हुई थी
वो बहुत दुखी होती है
उसकी अलमारी बंद होती है
उसकी चाभी उसने उसी जगह छिपा दी थी जाते समय
एक गड्ढे मे
जो अब उसे मिल चुकी थी
वो अलमारी खोलती है और अपनी रखी हुई वस्तुएं देखती है
अपनी वही पुरानी वीणा जिसको बजाकर वो वीर सिंह के सामने गाना सुनाती थी
वही घुँघरू जिसको बाँध कर वो वीर सिंह के प्यार मे पागल होकर नाचती थी क्रमशः
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