देव दासी भाग 580

सुरुचि अपने उन्हीं पिछले दिनों में खो जाती हैं और वीर सिंह की यादों मे

कितने मीठे थे वो पल

कितना प्यार किया था वीर सिंह ने और वो उसी पुरानी हवेली की तरफ बढ़ चलती है जहां उसने वीर सिंह के साथ कुछ पल गुजारे थे

शायद वो पल उसकी जिन्दगी के आखिरी सुखद पल थे

आगे बढ़ती है तो देखती है कि हवेली का दरवाजा कुछ खुला सा था

चारो ओर धूल और गंदगी

मकड़ी के जाल लगे हुए थे

चारो तरफ छोटे छोटे पेंड और झाड़ी उगी हुई थी

वो बहुत दुखी होती है

उसकी अलमारी बंद होती है

उसकी चाभी उसने उसी जगह छिपा दी थी जाते समय

एक गड्ढे मे

जो अब उसे मिल चुकी थी

वो अलमारी खोलती है और अपनी रखी हुई वस्तुएं देखती है

अपनी वही पुरानी वीणा जिसको बजाकर वो वीर सिंह के सामने गाना सुनाती थी

वही घुँघरू जिसको बाँध कर वो वीर सिंह के प्यार मे पागल होकर नाचती थी क्रमशः

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