
उसे याद आता है वो पल जब वो वीर सिंह को वीणा बजा कर गीत सुनाती थी और वीर सिंह उसका गीत सुनकर अपना सबकुछ सुरुचि के उपर लुटा देते थे
जो सुरुचि की इच्छा होती सबकुछ मिल जाता
वीर सिंह के साथ रहकर उसकी सारी इच्छायें तृप्त हो चुकी थी
वो भूल चुकी थी अपना अस्तित्व
अपने आपको की वह एक देव दासी है जो वीर सिंह का मन बहलाने के लिए आई है
वह भूल चुकी थी खुद को
अपने आपको
अपने अस्तित्व को
और अपनी उस जगह को जहां से वह आई थी
और उसके बाद उसे वापस जाना हैं
वह वीर सिंह के प्यार मे डूब चुकी थी
वह वीर सिंह को बहुत प्यार करने लगी थी क्रमशः
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