
अपने सजे हुए उस रूप को याद करती हैं और याद करती है कि वीर सिंह उसे कितना सज़ा कर रखते थे और सुरुचि के प्रेम मे इस कदर डूब जाते थे कि उन्हें कुछ ध्यान ही नहीं रहता
सुरुचि वीर सिंह की हर खुशी का ध्यान रखती थीं
वीर सिंह भी सुरुचि से बहुत खुश रहते थे
सुरुचि को मालूम था कि वह एक देव दासी है उसे किसी के प्रेम मे इस कदर नहीं डूबना चाहिए
वीर सिंह के कोई संतान नहीं थी इसलिए वह सुरुचि को मंदिर से उसकी कीमत चुका कर लाए थे
उन्हें संतान सुख प्राप्त करना था इसीलिए सुरुचि को वो बहुत प्यार करते थे ताकि संतान बुद्धिमान और सुंदर पैदा हो
सुरुचि इस बात को भूल चुकी थी कि वह एक देव दासी है सिर्फ वीर सिंह का वारिस देने आई है
लेकिन वह किस तरह खो चुकी थी वीर सिंह मे
क्रमशः
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