देव दासी भाग 583

लेकिन सुरुचि ये क्या सोंच रही थी वो तो सारा समय बीत चुका था लेकिन

वह उस हवेली मे जो पुराणी और बंद पड़ी थी उसमे अपनी यादें समेट रही थी

उसकी वो वीणा जो एक अलमारी मे बंद पड़ी हुई थी उसे वह बार बार देख रही थी उसमे धूल हम चुकी थी और भी बहुत कुछ था वहां जो याद कर कर के वह मंद मंद मुस्करा रही थी

लेकिन अब उसकी एक याद और भी जुड़ी थी जिस जगह पर वीर सिंह ने उसे थप्पड़ मारा था और वह सिसक रही थी

क्योंकि वीर सिंह की जरूरत पूरी हो गई थी उनका मन भी सुरुचि से भर गया था और सुरुचि के बच्चों को भी वीर सिंह ने छीन लिया था

उनके बच्चे ठाकुर की वारिस थे

वीर सिंह को अब वारिस मिल चुके थे एक नहीं दो बेटे एक साथ

और अब वीर सिंह सुरुचि को जान से मारना चाहते थे

सुरुचि को वह स्थान भी याद आता है जहां सुरुचि को जहर दिया गया

वो स्थान भी याद है जहा सुरुचि का गिलास गिर गया था और एक चूहा उसका मीठा सुगंधित पेय पी रहा था और उसकी चीखें निकली थी जब वह चूहा तड़प कर मर गया था

क्रमशः

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