
सुरुचि अब आगे का समय याद नहीं करना चाहती क्योंकि वो अब दुखी भी नहीं होना चाहती उसने दुनिया का ये रूप देख लिया था
और अब वो यहा से निकलना चाहती थी
वह जान चुकी है कि आज उसकी वज़ह से उसकी बेटी मंजू लता की जान खतरे मे है
लेकिन अब वह यहां रुकना भी नहीं चाहती और वह अपनी वीणा को एक बार फिर से अपने माथे से लगाते हुए वही पर वापस रख देती है और वह उसके तारो को छुना भी नहीं चाहती
अभी तो गीता को छोडकर किसी को भी कुछ नहीं पता है कि सुरुचि कौन है
अब सुरुचि एक बार अपने बनाए हुए मंदिर को एक बार देखना चाहती हैं और आगे की तरफ बढ़ जाती है
वहां पर अपने लगाये गये आंवले के पेंड की तरफ देखती है कि आंवले का पेंड बहुत बड़ा हो चुका था उसमे पके हुए आंवले लगे हुए थे और कुछ नीचे पड़े हुए थे
Respectively
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