देव दासी भाग 585

जब याद आता है तब सुरुचि अपने हाथों से अपना मुहँ ढक कर रोने लगती है लेकिन अब वह अपने आंसुओ को पोंछ लेती है और बढ़ चलती है उस जगह पर जहां पर उसकी यादें जुड़ी हुई हैं बरसों पुरानी

अब वह अपना सारा सामान उसी स्थान पर रख देती है

अब वो कुछ भी देखना नहीं चाहती

शिव जी के मंदिर के पास जाती है और वहां पर लगे उस आंवले के पेंड को देखती है

उसमे कितने सारे आंवले लगे थे वह पेंड बहुत बड़ा हो गया था लेकिन बिल्कुल वीरान सा हो गया था उसके पास सिर्फ पंछी थे

और आंवले जमीन मे बिखरे हुए थे और कुछ लगे हुए थे आंवले पक चुके थे

तभी उसका तोता उसके पास आ गया था उसके पास बैठा हुआ था

कुछ कहना चाहता था अपना सिर हिला रहा था

ये वही तोता था जिसे बहुत साल पहले सुरुचि बचा कर लाई थी

सुरुचि उसे देखकर हंसने लगी तोता भी हंस रहा था

क्रमशः

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