देव दासी भाग 587

अचानक सुरुचि शिव जी के ध्यान मे मग्न हो जाती है और वह प्रार्थना करती हैं कि उसे अब इस जन्म से मुक्त कर दो

तभी उसका ध्यान पहाड़ी की तरफ जाता है

उसका ध्यान टूट जाता है

पहाड़ी के उस पार धूँआ ही धूँआ उठ रहा था

अब वह देखने के लिए उठती है लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं देता है

पीछे की तरफ ध्यान लगाते हुए वह उठती है आगे बढ़ती है तो देखती है कि झोपड़ी में आग लगी है

वो वहां तक तो पहुंच नहीं पाती लेकिन वह जोर से भागती है और वही पर जाने का प्रयास करती है वह जहां से आई थी

वो वापस गीता के पास पहुंच जाती है और गीता से कहती है कि उस झोपड़ी से आग निकल रही है

गीता जोर से हंस पड़ती है कहती हैं कि वहां कोई नहीं जाता तुम कैसे वहां  चल दी

तुम्हें डर नहीं लगा

क्या अपनी पुरानी यादें समेटने गई थी

मैने तुम्हारे बारे में किसी को कुछ नहीं बताया वीर भईया को नहीं पता है कि तुम यहाँ पर हो

कामिनी भाभी को तुम्हारा सत्य मालूम नहीं है

अभय और रोहित को भी तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पता

तुम चुप ही रहना

अज्ञातवास मे रहो वही तुम्हारे लिए बेहतर होगा

तुम्हारा अतीत का अब कोई महत्व नहीं है तुम वीर सिंह के लिए मर चुकी हो

क्रमशः


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