हुमायूँ ने नहीं की थी रानी कर्णावती की सहायता…. झूठी कहानी गढ़ी इतिहासकारों ने…काफिर राज्य की पराजय की प्रतीक्षा में था हिमाँयू…हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि युद्ध की विपत्ति के दौरान मेवाड़ की रानी कर्णावती ने मुग़ल शासक हुमायूँ को पत्र और राखी भेजी थी, जिसके बाद वो तुरंत उनकी सहायता के लिए निकल पड़ा था। मुगलों को महान बनाने के लिए जिस तरह की तिकड़मों का जाल बुना गया है, उनमें से एक कहानी यह भी है। उस समय के इतिहास में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं मिलता? अब प्रश्न यह कि यह प्रचलित झूठी कहानी कहाँ से आई। 19वीं शताब्दी में मेवाड़ की अदालत में कर्नल जेम्स टॉड नाम का एक अंग्रेज था। उसने ही ‘Annals नाम की एक पुस्तक लिखी थी। इसी पुस्तक में इस झूठी कहानी का उल्लेख था। ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के जेम्स टॉड ने ही सन् 1535 की इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा था कि राखी पाकर हुमायूँ तुरंत कर्णावती की सहायता के लिए निकल पड़ा था। टॉड लिखते हैं कि ब्रेसलेट पाकर हुमायूँ काफी खुश हुआ था। टॉड ने राखी जैसी पवित्र चीज के लिए ब्रेसलेट जैसे शब्द प्रयोग किया है, जबकि राखी एक अति पवित्र धागा है, ब्रेसलेट नहीं है। टॉड ने लिखा है कि हुमायूँ ने खुद को एक सच्चा शूरवीर साबित किया।अब इसी कहानी को इतिहास के दृष्टिकोण से समझते हैं। सबसे पहले तो यह बात ध्यान देने की है कि महारानी कर्णावती, राणा सांगा की पत्नी थीं। महाराणा संग्राम सिंह उर्फ़ राणा सांगा ने राजपूतों को एकजुट कर मुग़ल शासक बाबर के खिलाफ एक मोर्चा बनाया और सन् 1527 में खानवा, राजस्थान के भरतपुर में, के युद्ध में बाबर से भिड़े।यद्यपि बाबर की तोपों, फौज में जिहाद की भूख भरना और नई तकनीकों का इस्तेमाल मुगलों के काम आया। राणा सांगा बुरी तरह घायल हो गए और कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद बड़े बेटे विक्रमादित्य को सिंहासन पर बिठा कर महारानी कर्णावती ने शासन शुरू किया। उनका एक छोटा बेटा भी था, जिसका नाम था, राणा उदय सिंह। वही राणा उदय सिंह, जिन्होंने 30 वर्ष से भी अधिक समय तक मेवाड़ पर राज किया और उदयपुर शहर की स्थापना की। उनके ही बेटे महाराणा प्रताप थे, जिन्होंने अकबर की नाक में दम किया था। इधर बाबर की मौत के बाद 1530 में हुमायूँ गद्दी पर बैठा। उस समय गुजरात पर बहादुर शाह का राज़ था। बहादुर शाह ने अपने राज्य के विस्तार के लिए कई युद्ध लड़े। हुमायूँ के आक्रमण के बाद ही उसके राज़ का अंत हुआ था। बाद में समुद्र में पुर्तगालियों के साथ एक बैठक के दौरान बात बिगड़ गई और वो मारा गया। ये वही बहादुर शाह था, जो कभी अपने अब्बा शमशुद्दीन मुजफ्फर शाह और भाई सिकंदर शाह के डर से चित्तौड़ में छिपा था।बाद में बहादुर शाह ने मालवा को जीता और फिर उसने चित्तौड़ पर ही धावा बोल दिया। इतिहासकार सतीश चंद्रा अपनी पुस्तक ‘History Of Medieval India‘ में लिखते हैं कि किसी भी तत्कालीन लेखक ने कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजने की किसी भी घटना का कोई उल्लेख नहीं किया है।यह कहानी काल्पनिक है।तब फिर सच्चाई क्या थी? यथार्थ में हुआ क्या था, जो हमसे छिपाया गया?पुस्तक ‘The History of India for Children (Vol. 2): FROM THE MUGHALS TO THE PRESENT’ में अर्चना गरोदिया गुप्ता और और श्रुति गरोदिया लिखती हैं कि हुमायूँ तो चित्तौड़ पर सुल्तान बहादुर शाह के कब्जे के कई महीनों बाद चित्तौड़ पहुँचा था। वो तो प्रतीक्षा कर रहा था कि कब मेवाड़ का साम्राज्य ध्वस्त हो। इस दौरान बहादुर शाह भी खुलेआम चित्तौड़ में मारकाट और लूटपाट मचाता रहा। उसके मंत्रियों ने उसे कह रखा था कि वो एक काफिर से लड़ रहा है, इसीलिए मुस्लिम होने के नाते हुमायूँ उसे नुकसान नहीं पहुँचाएगा। हुमायूँ ने स्वयं चित्तौड़ पर उसका अधिकार हो जाने तक प्रतीक्षा की।उसके बाद हमला बोला और गुजरात व मालवा पर अधिकार जमा लिया। इस तरह बहादुर शाह की सल्तनत का अंत हो गया।चित्तौड़ युद्ध के बीच, हुमायूँ और बहादुर शाह के बीच पत्राचार भी हुआ था, जिसका वर्णन एस के बनर्जी ने अपनी पुस्तक ‘हुमायूँ बादशाह‘ में किया है। बहादुर शाह ने पत्र लिख कर हुमायूँ को बताया था कि वो काफिरों को मार रहा है और हुमायूँ भी ऐसा ही करे। प्रत्युत्तर में हुमायूँ ने लिखा था कि उसके दिल का दर्द ये सोच कर खून में बदल गया है कि एक होने के बावजूद अब तक हम दो क्यों रहे। इस कहानी को एक पवित्र हिन्दू त्यौहार से जोड़ कर रक्षाबंधन को कलंकित करने की कोशिश की गई। रानी कर्णावती का क्या हुआ?  चित्तौड़ में तीन जौहर हुए थे, उनमें से एक रानी कर्णावती का जौहर भी था। जहाँ पुरुषों को केसरिया वस्त्र पहन कर युद्ध के लिए निकलना पड़ा, अंदर किले में रानियों ने अन्य महिलाओं के साथ जौहर किया। इन महिलाओं ने इस्लामी शासकों के हाथों में जाने की अपेक्षा मृत्यु का वरन किया।राजकुमारों को एक सुरक्षित जगह पर रखा गया था, इसीलिए वो बच गए। इस्लामी फ़ौज ने अंधाधुंध लूटपाट और असंख्य बच्चों की भी हत्या की थी। कर्णावती के राखी भेजने पर हुमायूँ द्वारा सहायता करने की कथा उतनी ही झूठी है, जितनी जोधा-अकबर की। जेम्स टॉड ने ही सर्वप्रथम जोधा के नाम का उल्लेख किया था। उससे पहले कहीं नहीं लिखा है कि अकबर की किसी पत्नी का नाम जोधा था। ये भी एक बनावटी कहानी भर है।♦️♦️राजपूताने में हुये तीन जौहर के बाद बंद कर दिया गया था जौहर कुंड। जौहर कुंड में से रानियों और राजपूतानी महिलाओं के विलाप और चिल्लाहट की इतनी तेज आवाजें आतीं थी कि इसे बंद करने के निर्देश दे दिए गये। एक लम्बे अंतराल के बाद चित्तौड़ के राजाओं ने इसको फिर महिलाओं की वीरता के प्रतीक स्थल के रूप में सम्मान पूर्वक खुलवाया। करीब 60 साल पहले पुरातत्व विभाग ने चित्तौड़गढ़ में खुदाई की थी। इस खुदाई में भी जौहर के प्रमाण मिले थे।यहाँ की दीवारों में आज भी जौहर कुंड की आग कि गर्माहट को अनुभव किया जा सकता है, जब भी किसी ने इस कुंड के पास जाने की कोशिश की तो, उन्हें आपत्तिजनक अनुभवों का सामना करना पड़ा।🙏🙏

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