मै केवल बोध है जीवन में जो बोध हैं बोध घटित है उसका कारण में हूं, मै हूं तो बोध है मै नहीं हूं तो बोध नहीं है मै दर्शन हूं, मै दृष्टा हूं, जो मेरे भीतर घट रहा है उसको दखने वाला मैं हूं, सिर्फ दृष्टा मै हूं, घटना घटाता नहीं हूं उसका कारण चेतना और जड़ है, जड़ चेतना तीसरा में हूं, बुद्धि इंद्री यह सब यंत्र हैं, स्त्री पुरुष के मध्य एक बोध होता है यह का अनुभव करता मै हूं, देखती है आंखे लेकिन जो घटित होता है उसका बोध मन में हूं, दर्द सुख दुख आनंद जो भी बोध है अनुभव है वह सिर्फ मन में होता है उसका कारण कोई दूसरा है लेकिन देखने वाला जिसे बोध होता है वह मन मै हूं, जो घट रहा है वह खेल जड़ चेतन से घट रहा उसका दर्पण में हूं उसका दर्शन मै हूं, मै विचार नहीं करता विचार बुद्धि क्षेत्र अलग है, जो जड़ है वह बुद्धि से पैदा होते है, मन शब्द नहीं है, मन सुगंध नहीं गंध सुगन्ध नाक से मिलती है, यदि नाक काम नहीं करेगा तब मन तक सुगंध का बोध नहीं होगा, आंखे बंद है तब कोई दृश्य नहीं देख सकते है, आंख ओर सामने दृश्य के बीस घटना है लेकिन जो बोध होता है वह मन है, मै, हूं
सिर्फ में बोध हूं में कोई घटना नहीं हूं घटना का साक्षी में हूं मेरी जीभ ओर वस्तु से एक स्वाद घटा, जीभ ओर वस्तु माध्यम है, स्वाद जो अनुभव है उसका उत्तर मन देता है,
तब दुनिया कहती मै साधू संत ऑफिसर नेता फला फला धनवान ज्ञानी हूं, तब मै ज्ञानी नहीं हूं ज्ञान भीतर चेतना जड़ बुद्धि के माध्यम से घट रहा है, तब मेरे भीतर मैं ज्ञान देने वाला मै नहीं हूं जो भीतर से बुद्धि चेतना जड़ पंच तत्व भीतर घट रहा उसका साक्षी में हूं, मै इस ज्ञान का कर्ता नहीं हूं मेरी औकात दृष्टा कि है मै कुछ घटा नही सकता हूं जो घट रहा है उसे देखता हूं,
जब कहते हो कि मै ज्ञानी हूं मैं वैसा हूं मै ऐसा हूं, मै अच्छा बुरा हूं, यह मै नहीं है मै सबका साक्षी हूं, जो भी भीतर बाहर घट रहा है उसका साक्षी में हूं घटने का कारण मै नहीं हूं , आप घटना का कारण बनते है कि मैने घटाया, मै कहता हूं घट रहा है, मै घटा नहीं रहा हूं, यदि मै कर्ता होता तब कुछ भी असंभव नहीं है, सब कुछ मै कर सकता हूं लेकिन कर्ता में नहीं हूं,
मै सिर्फ देखने की मालिकी रखता हूं, कही पर दो चार भीड़ के मध्यम जो भी घटता है उसका साक्षी में हूं,,
इसीलिए मै सिर्फ केवल साक्षी हुआ दूसरा मै नहीं हूं कारण मे नहीं हूं मै सिर्फ सिर्फ दृष्टा हुआ तब मेरे सामने मेरे भीतर मेरे समक्ष ईश्वर की सर्वोत्तम घटना भी संभव है उसे देख सकता हूं संसार की श्रेष्ठ सर्वोत्तम अदभुत घटना के दर्शन कर सकता हूं यही ईश्वर का जो दर्शन है,
इसलिए मैं कहता हूं मै मेरे इस दृष्टा के सामने संसार ब्रह्मांड की श्रेष्ठ घटना का अनुभव देखा उसका दर्शन हुए है उस बोध को मैने देखा है दर्शन किया हैं,
क्योंकि मैं कर्ता से हटा, कर्ता ईश्वर को बनाया में तो सिर्फ खेल देखने वाला रह गया हूं l
इतना ज्ञान मुझे है इतना दर्शन मुझे हुआ है इसलिए मैं इतना कहता हूं कि सिर्फ दृष्टा बन जाओ, इतना देखने वाला मैं मन बन जाओ शेष जिसका भी मालिक कर्ता बन रहे है वह भ्रम है, अज्ञान है, वह मूर्खता है,
तब बुद्ध महावीर शिव सिर्फ बैठे है भीतर आनंद घट रहा उसे देख रहे है उस पर दृष्टि जमा कर बैठे है को भीतर अति सुक्ष्म तल पर घट रहा है आप अधिक स्थूल है जड़ है तब आपको केवल बड़ी जड़ घटना का बोध होगा जो सुक्ष्म जगत में घट रहा है उसका बोध उसका दर्शन नहीं है, इसलिए आपको सब कुछ उलझा उलझा दिखाई देता है l
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