भीख

एक बूढ़ा बाप भीख मांग रहा था अपने ही घर से दूर कुछ दूरी पर ,कितना सजाया संवारा था एक एक पसीने से बनाया था वो घर ,एक एक तिनके की तरह जुटा जुटा कर पैसा ,भर भर कर कलेजा फाड़ फाड़ कर सींचा था उस घर की बगिया को ,एक एक फूलों की पंखड़ियों को सहेजा था उसने खुद कांटों पर चल चल कर ,आज वो फूल ही उसको बूढ़ा हो जाने पर दुत्कारते ,थोड़ी सी गलती होने पर उसे अपने ही घर से हाथ पकड़ पकड़ कर निकलते ,एक एक चीज के लिए तरसते उसके बूढ़े हाथ ,सब खाते उसी की बनाई संपत्ति पर ,राज करते उसी के बनाए हुए घर पर ,घर के बाहर ,चोखट के बाहर बन गया उसका आशियाना ,मिलती थी उसे केवल दो जून की रोटी ,खांस खांस कर वो अपनी किस्मत की दुहाई देता आज अपनी ही चौखट के बाहर कुछ दूरी पर वो बूढ़ा बाप भीख मांग रहा ,पर वो फिर भी कभी भी अपने फूलों को बददुआ नहीं देता ,और फलने फूलने का आशीर्वाद देता ,ऐसा होता है एक बाप का सीना

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