
चोट देते हैं कुछ लोग पर पीछे से वार करते है ,कुछ भी यकीन नहीं होता इन लोगो पर पर क्या वो ये भी कर सकते है ,कितना यकीन था उन लोगों पर कितना भरोसा था उनकी बात पर ,कितना गर्व था उनकी औकात पर जिसे हम अपनी औकात समझते रहे ,गुरूर तो मुझे ही था ,सुरूर तो सिर्फ उन्हें था ,एक बार में गुरूर टूटा जब मारी उन्होंने एक धीरे से ठोकर और चोट आगे से नहीं पीछे से मिली
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