बेवफा से कैसा प्यार

“तुम्हारे झूठ को सच मानू,
या तुम्हारे सच को झूठ।
तुम्हीं बताओ कि अब,
तुम्हारे दिए जख्मों,
को कैसे भूल जाऊं ?

यकीं करूं तो क्यूं करूं, कैसे करू ?
तुम्हारे लिए वो प्यार खुद में कैसे जगाऊं ?
तुम्हारे झूठ से परदा अब तो उठ चुका है ,
तुम्हारे सच पर भी भरोसा खुद में कैसे जगाऊं ?
तुम्हारे झूठ से……

मेरे गुरूर को रौदा है तुमने जिस क़दर,
उस गुरूर को वापस कैसे मैं लाऊं,
जी चाहता है , तुम्हें भी उसी दर्द में रखूं,
जिस दर्द से ,रही मैं गुजर,
तुम दर्द दो मैं कागज़ पर उतारती रहूं।
हमारी मोहब्ब्त का तमाशा बनाती रहूं।
तुम्हीं बताओ, मैं तुम्हें कहां से लाऊं?
तुम्हारे झूठ …..

तुम्हारी यादें मुझे परेशान करती हैं,
चैन से जीने भी नहीं देती हैं।
और तुम रहते हो मतवाले से,
हर किसी के लिए दिलवाले से,
तुममें भी मुझसा प्रेम मैं कैसे जगाऊं ?
तुम्हारे झूठ को….


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