कितना भी छुपाऊं मन की ख्वाहिशों को
पंख लगा के उड़ ही आती है पलकों के सिरहाने
कितना भी छुपाऊं इन आंसुओं को
आंखों से छलक ही जाते हैं किसी बहाने से
कितना भी समझाऊं अपने मन को
दबे पांव भागा चला जाता है तुम्हारे पीछे
जाने अनजाने जुड़ती चली जाती हूं तुम से मैं
जानती हूं व्यर्थ है मेरी यह ख्वाहिशें
पर फिर भी तुमको जीती चली जाती हूं मैं
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