दरिंद्रो कुछ तो समझो

मालूम है क्या तुम्हे
वो लड़की कितना रोई होगी
महसूस किया क्या उसके दर्द को
जो खुद को खुद में दफन कर रही होगी
वो लड़की जो अब सब से दूरी सी रहती हैं
डरती है उस छुअन से जिससे उसकी रूह कांप उठी थी
मालूम है क्या तुम्हे
वो लड़की कितना रोई होगी
जो हर बंदे से एक अपना सा रिश्ता रख जाती थी
अब उसे नजर आते है
हर बंदे में एक दरिंदे
सोचती होगी रोती होगी
और खुद में घुट कर चुप हो जाती होगी
मालूम है क्या तुम्हे
वो लड़की कितना रोई होगी
जिसे उसपर सबसे ज्यादा विश्वास था
जब उसने उसके साथ की जबर्दस्ती होगी
सोचो ना उस लड़की की क्या हालत हुई होगी
मालूम है क्या तुम्हे
वो लड़की कितना रोई होगी
डर सी जाती होंगी
सहम जाती होगी
जब किसी बंदे को खुद के करीब पाती होगी
की वही मंजर फिर दोहराएगा
फिर मेरे जिस्मों से कोई खेल जायेगा
वो लड़की टूट सी जाती होगी
मालूम है क्या तुम्हे
वो लड़की कितना रोई होगी
उसके सपने चूर हुए
एक चेहरा से नकाब जो उठा था
जिसपर खुद से ज्यादा भरोसा करती थी
उसने उसका भरोसा तोड़ा होगा
किया होगा उसे उस एक अंधेरे कमरे में बंद
फिर उसके जिस्म से उसके मर्जी के बगैर खेला होगा
मालूम है क्या तुम्हे वो लड़की कितना रोई होगी

“दरिंद्रो कुछ तो समझो” को एक उत्तर

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