जिंदगी का पैग़ाम

कुछ अजीब सा खल रहा है
सबकुछ तो सामने है ,पर ढूंढने के लिए मन मचल रहा है

यूँ तो समय बहुत है पर आज कल , आज कल के बहाने दिन टल रहा है
जी तो चाहता है खूब आगे बढ़ जाने का पर ,पग पग पर मन बदल रहा है
मै जानता हुँ की जीतने के लिए दौड़ना पड़ेगा, पर पांव पैदल ही चल रहा है

हल तो सामने है समस्या का ,पर चेतना आत्मविश्वास की कमी से नही उछल रहा है
अत्याचारे हो रही है सामने मे ,पर उसे रोकने के लिए कहाँ मेरा पराक्रम चल रहा है

लोग दाने के लिए तरस रहे है ,फिर भी दिल नही मेरा पिघल रहा है
रौशनी लाने की बाते करता हुँ, पर रूह अंधेरे मे ढल रहा है

कुछ अजीब सा खल रहा है …
सबकुछ तो सामने है पर ढूंढने के के लिए मन मचल रहा है🙏🙏🙏🙏🙏

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