महफिल में आए,शराफत ओढ़ के,
मुस्करा के हंस रहे दिल तोड़ के।
खामोशी ने जब शरारत से देखा,
वो पीने लगे जहर अमृत छोड़ के।।
सिसकते दियालों को देखो गौर से,
फिर जल उठेंगे रहमत के दौर से।
ताक की निगाह से दया कीजिए,
ये भी जगमगाएगे इस नये दौर में।।
हया को बचालो पर्दे की ओट से,
रिश्ते बचालो चाहत के वोट से।
मर्यादा दहलीज के चिराग बनो,
संस्कार बचाओ पश्चिमी चोट से।।
टूटता है मन अपनों की खोट से,
रोता है दर्द मतलब की मोच से।
बगुला भगत जो बैठें है ध्यान में
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