मैं मर चुकी हू ये एहसास हुआ जब

एक अजीब सी नींद मे

ना कोई सपना

ना कोई अपना सब रिश्ते छोड़ गई मैं जब मौत की नींद मे

जब देखा मैंने अपना निर्जीव शरीर

आज कैसे पड़ा हुआ था

धरा पर जैसे

अब कुछ भी नहीं बचा ना

हंसने मे ना रोने मे

कुछ आवाजें आ रही थी उनकी

जिनको मैंने अपने जीवन मे समझा था अपना

विचारों को जैसे पढ़ने की शक्ति

जैसे आ गई थी मेरे

एक माँ बस रो रही थी मेरे लिए

और कह रही हो जैसे

पुकार रही हो मुझे

उसकी ममता चीख चीख कर कह रही थी मुझसे

ये कोई सोने का समय है

उठ जा जल्दी से अभी बहुत काम समेटने है तुम्हें

भाई के विचारों को पढ़ लिया

भाई कह रहा हैं कि अच्छा हुआ चली गई अब तो कोई जायदाद मे हिस्सेदार नहीं होगा मेरा

पिता के विचारो की अवाज सुनी तो वो कह रहे थे कि डोली मे बैठा कर बिदा किया इज़्ज़त से और तेरी अर्थी भी निकली सम्मान से, उसी घर से उठी जिस घर से उठानी थी

बेटे रो रहे थे कह रहे थे कि अब कौन खाना बनाएगा हमे नहीं आता खाना बनाना मैंने विचारो को पढ़ लिया और कहा कि जिनको पाल पोस कर बड़ा किया वे आज खाने को रो रहे थे

पति के विचार कह रहे थे कि अभी खटिया और गाड़ी का प्रबंध करना है इसको ले जाना है जितनी जल्दी काम हो जाए उतना ही अच्छा मैं भी राहत ले लूँ अब जरा

धरा पर पड़ा शरीर अब मुक्त हो चुकी आत्मा इस बंधन से

पछता रही थी कि हाय जिनको अपना समझा ,मैंने कितना कुछ किया, अब मैं चली अपनी राह पर, उड़ चली एक धुएँ का रूप लेकर,बादल बनकर एक ओस का रूप लेकर मैं मुक्त हो चली मैं मुक्त हो चली

“मैं मर चुकी हू ये एहसास हुआ जब” को एक उत्तर

Leave a reply to Interesting Blogs जवाब रद्द करें

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें