परमात्मा एक प्रकाश है जो अपने ही अंदर बसा हुआ है

संतो ने हमें समझाया है हमारे अंदर परमात्मा का शब्द चल रहा है जब हम भजन पर बैठते हैं धीरे-धीरे हमारा मन टिकने लगता है और हमारी आत्मा सिमरन के द्वारा रुहानियत मंडलों में बढ़ने लगती है हमें अनहद शब्द तक पहुंचने के लिए काम क्रोध लोभ मोह अहंकार को छोड़ना पड़ेगा और हर रोज भजन सिमरन मैं लगन लगानी पड़ेगी जब तक हमारी आत्मा शब्द तक नहीं पहुंचती तब तक हम काल के दायरे से निकल नहीं सकते। अनहद शब्द हमें पारब्रह्म में सुनाई देगा फिर हमारी आत्मा चौरासी लाख योनियों से मुक्त हो जाती है और अपने निजधाम सचखंड पहुंच जाती है मनुष्य जन्म का मकसद आत्मा का मिलान परमात्मा में पूरा हो जाता है।

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