मैंने लोकल ट्रेन का भी सफर किया है मैं कोलकाता से कानपुर आ रही थी आ रही थी, पापा के पास पैसे नहीं थे उन्होंने एक टिकट कटवा लिया तब टिकट बड़ी मुश्किल से मिलती थी आजकल तो ऑनलाइन ही टिकट हो जाती है तब आज से 28 साल पहले की बात है
अब पापा को मुझे कानपुर लाना था मैं भी वैसी ही थी जंगली सी, अल्हड सी थी, कहीं भी घुस जाती थी कुछ भी खा लेती थी कहीं भी सो जाती थी साथ मे मेरे बड़े भाई भी थे
अब एक ट्रेन आती हुई दिखाई दी मेरे पास एक बक्सा था लोहे का suitcase भी नहीं था मेरे पास तो मैं अपने बक्से के ऊपर बैठी थी मैं उस समय 21 साल की पूरी नहीं हुई थी जब ट्रेन आती दिखाई दी तब पापा चिल्लाए इसी मे घुसने का है तैयार हो जाओ
इसमें बड़ी भीड़ थे लोग जल्दी जल्दी घुस रहे थे मेरे पति बोले अरे ये मर जाएगी इसमे पापा बाद मे इसको ले जाना चलो चलो घर चलो तुम मैं इसमे तुम्हें नहीं घुसने दूँगा अब तो मेरी जान सुख गई मैं सोंचने लगी कि मैंने रात मे जाग कर पूरी सब्जि बनाई है खाने का इतना सामान रखा है मैं तो जाऊँगी और मैंने उनसे कहा नहीं मैं जाऊँगी मुझे जाने दो आप
पापा ने कहा कि अभी गाड़ी छूट जाएगी बोलो मत ज्यादा
और मैं दुबली पतली थी दादा ने बक्सा पकड़ लिया और ट्रेन के अंदर जोर लगाया और घुस गए उधर मैं उनका हाथ पकड़े हुए थी अखिरकार मैं भी घुस गई और दादा का हाथ छूट गया मैंने अपने पति की तरफ देखा ही नहीं वो बार बार मेरा मनोबल गिरा रहे थे अखिरकार हम तीनों ट्रेन मे घुस गए बैठने की जगह नहीं मिली
मेरा लोहे का बक्सा जिंदा बाद
मेरे बाल बिखर गए थे साड़ी खुली जा रही थी एक आदमी मुझे पकड़ कर खींचे लिए जा रहा था पति खिड़की से चिल्लाये, अरे ये हमारा मेहरारू है अब वो आदमी मेरा हाथ छोड़ कर आगे बढ़ गया मैं एक तरह खड़ी थी सारा मेकअप खराब हो गया था मेरे पास सिर्फ पानी का डिब्बा था बाकी सब दादा और पापा के पास था
अब मैं सबको खोज रही थी पति फिर खिड़की से चिल्लाये अभी भी वक्त है बाहर आ जाओ नहीं दुर्दशा हो जाएगी बहुत भीड़ है ट्रेन मे मगर मैं नहीं गई
इतने मे ट्रेन छूट गई दादा और पापा का पता नहीं था
अब मैं एक कोने मे खड़ी थी लेकिन वहा पर भी कुछ महिलाएँ थी बच्चे थे कुछ लड़के भी थे
मैं अकेली थी लेकिन मित्रों दुनिया बुरी नहीं होती अपनी सोंच बुरी होती है मैंने किसी से कुछ नहीं कहा तभी एक लड़के ने मुझसे कहा कि दीदी बैठ जाओ आप
मैंने कहा कि भैया पता नहीं मेरे दादा पापा कहा चले गए
तभी उधर से एक लड़के ने मुझे देखा और कहा कि आप इधर आओ यहां बैठो लेकिन मेरे पास जो महिलाये थीं उन्होंने कहा कि नहीं ये हमारे साथ है
और मैं उन लोगों के साथ बैठ गई गाड़ी जोर से चलने लगी और मैं अब रोने लगी मेरी हिम्मत टूटने लगी मैंने कहा कि मेरे पापा, दादा नहीं आए तो सबने कहा बिटिया घबराई नहीं आ जाएंगे हम सब साथ है तुम यही रहो
करीब आधा घंटे के बाद मैंने एक लड़के से कहते सुना कि तुम्हें दो आदमी खोज रहे हैं उन्हें तुम जानती हो
मैंने कहा कि कहां है तभी एक महिला बोली कि उन्हें यहां ले आओ ये कहीं नहीं जाएगी
तभी मैंने देखा कि दादा चले आ रहे थे और मैं उन्हें देखकर फिर रोने लगी और उनसे लिपट गई, दादा पापा कहा हैं दादा ने कहा कि वो वहां बैठे हुए है एक सीट मिल गई है
दादा ने उन लोगों को बहुत धन्यावाद दिया और हम लोग आगे बढ़ गए वहां देखा कि पापा भी वहां पर खाने का झोला लिए, बक्सा और कुछ और सामान लिए बैठे थे
थोड़ी ही देर मे भीड़ भी कम हुई और सब बैठ गए एक दूसरे का सहयोग करते हुए सफर को आगे बढ़ा रहे थे लगता था कि सब अपने ही हैं
थोड़ी देर मे गाड़ी रुकी चाय वाला भी आ गया हम लोगों ने चाय पी बिस्कुट खाया एक बच्चा भी मेरे पास बैठा था उसको भी मैंने बिस्कुट दिया
सब एक दूसरे से बात कर रहे थे तभी ट्रेन मे एक आदमी बीड़ी पीने लगा सब मना करने लगे लेकिन थोड़ी देर मे उससे लड़ाई-झगड़े होने लगे अखिरकार वो आदमी भाग गया
इसी तरह हम लोग खाते पीते चले जा रहे थे
एक चाचा कहानी सुना रहे थे
एक लड़की गाना गा रही थी
कोई रेडियो लाया था
उस गाड़ी का नाम तूफान मेल था बिहार होकर जाती थी अब वहां पर देसी चीजे मिल रही थी समोसे खूब बड़े बड़े, कुल्हाड़ वाली इलायची वाली चाय मैं खिड़की के पास बैठी थी सफर का मजा ले रही थी सोने का कोई वही ठिकाना नहीं था
बैठकर ही जाना था
फिर हम लोगों ने खाना खाया, सब्जी पूरी, अचार, भुजिया और मिठाइयाँ, केले भी खाए
इंसान को हर परिस्थिति मे गुजर करनी चाहिए
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