देव दासी भाग 527

कामिनी अपने बीते हुए दिनों को याद कर रहीं थीं कि किस प्रकार वह जंजीरों मे जकड़ चुकी थी ठाकुरों कि बेटी और फिर ठाकुरों कि बहू बन कर वो किस तरह से सोने के पिंजरे मे सिसकती रहीं

आज उसे नफरत है ठाकुरों के आलीशान महल से जिसमें उनकी बहू बेटियाँ सिसकती है और अपने आंसू अंदर ही अंदर पीती रहती हैं ऐसे ही कामिनी ने भी घुट घुट कर आंसू पिए उसे माँ बनने का भी सौभाग्य नहीं मिल पाया प्यार क्या होता है वो आज भी समझ नहीं पाई उसे सिर्फ पति की आँखों मे वासना ही वासना दिखाई पडी उसके पति ने कभी भी उसके साथ बैठ कर बात नहीं की ना ही उससे कोई सलाह मशविरे किए कामिनी वीर सिंह के पास जैसे बिक गई थी

शादी होने से पहले ही वह समझ नहीं पाई की ठाकुर कैसे होते हैं पति क्या होता है ये तो उसे शादी होने के बाद ही समझ मे आया

सोने चांदी और हीरो के जेवरात से सजी हुई ठाकुर की पत्नी कितना सबकुछ सहती है उसे क्या पता था क्रमशः

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