देव दासी भाग 530

और कामिनी फिर से अपने पुराने दिनों मे खो जाती हैं अखिरकार उसकी शादी का समय भी आ जाता है शादी बहुत धूमधाम से संपन्न होती है जैसे कि कोई राजकुमारी थी कामिनी और अब उसकी बिदाई कि बेला आती है सारी सखियाँ सहेलियों और अपने परिजनों से बिछड़ना कामिनी को बेहद दुखद लग रहा था माँ तो रो रो कर पागल हो रहीं थीं भाभियों कि आंखे नम थी सुहाग का सिंदूर कामिनी कि मांग मे चमक रहा था कीमती जेवरात से कामिनी लदी हुई थी

हाँथों में मेहंदी,पैरों मे पायल की आवाज कितनी सुन्दर प्रतीत हो रहीं थीं डोली भी फ़ूलों से सज चुकी थी पूजा पाठ के सारे रीति रिवाज पूरे हो चुके थे वीर सिंह और उनके परिजन वही कुछ दूर खड़े थे

डोली को दूर से देखकर कामिनी का दिल बैठा जा रहा था वो अपने बड़े भाई की गोद मे थी उस समय भाई ही अपनी बहन को डोली मे बैठाते है उसके भैया भी बहुत रो रहे थे

कामिनी अपने भाई से चिपक कर रोने लगी थी वो जान चुकी थी कि आज से भाई और सब पराय हो गए सबकुछ छूटा जा रहा था अब वो जान चुकी थी कि अब ये गलिया भी पराई हो चुकी वो अब मेहमान बन चुकी थी क्रमशः

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