संत नामदेव

⭐️ संत नामदेव के जीवन के साथ चमत्कारी घटनाएँ ⭐️
👉सच्चे, सरल और निष्कपट भाव से जब हम भगवान को भजते हैं, तब ही भगवत्कृपा हमारे भीतर उतर सकती है।
🌷 संत नामदेव अपनी उच्चकोटि की आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए ही विख्यात हुए l वह चमत्कारों के सर्वथा विरुद्ध थे l मानते थे कि आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है तथा परमात्मा की बनाई हुई इस भूमि तथा संसार की सेवा करना ही सच्ची पूजा है l इस धरती पर जीवों के रूप में विचरने वाले विठ्ठल की सेवा ही सच्ची परमात्मसेवा है। इसी से साधक भक्त को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है l 80 वर्ष की आयु तक इस संसार में गोविंद के नाम का जप करते-कराते सन् 1350ई. में संत नामदेव स्वयं भी इस भवसागर से पार चले गए l
🌷 संतों के जीवन के साथ कतिपय चमत्कारी घटनाएँ जुड़ी रहती है। नामदेव जी की पूर्व जन्म की भक्ति की शक्ति से परमेश्वर ने चमत्कार किए। नामदेव के चरित्र में “सुल्तान की आज्ञा से इनका मृत गाय को जिलाना ” , “पूर्वाभिमुख आवढ्या नागनाथ मंदिर के सामने कीर्तन करने पर पुजारी के आपत्ति उठाने के उपरांत इनके पश्चिम की ओर जाते ही उसके द्वार का पश्चिमाभिमुख हो जाना “,  “विट्ठल की मूर्ति का इनके हाथ दुग्धपान करना ” आदि घटनाएँ समाविष्ट हैं।
☘️ भक्त नामदेवजी का जन्म दक्षिण हैदराबाद में हुआ। माता-पिता निरंतर भगवान के नाम का गुणगान किया करते थे, तो नामदेव जी भी भगवान नाम सुनकर विट्‌ठलमय हो गए। संत नामदेव जी के माता-पिता भगवान बिठ्ठल की पत्थर की मूर्ति की पूजा करते थे। प्रतिदिन मूर्ति को दूध का भोग लगाया जाता था। उस समय नामदेव जी केवल 12 वर्ष के थे। एक समय माता-पिता को किसी कार्यवश दूर अन्य गाँव जाना पड़ा। अपने पुत्र नामदेव से कहा कि पुत्र! हम एक सप्ताह के लिए अन्य गाँव में जा रहे हैं। पहले बिठ्ठल जी को दूध का भोग लगाना, फिर बाद में भोजन खाना। ऐसा नहीं किया तो भगवान बिठ्ठल नाराज हो जाऐंगे और अपने को श्राप दे देंगे। अपना अहित हो जाएगा। यह बात माता-पिता ने नामदेव से जोर देकर और कई बार दोहराई और यात्रा पर चले गए l
👉 संत नामदेव जी ने सुबह उठकर स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर दूध का कटोरा भरकर भगवान की मूर्ति के सामने रख दिया और दूध पीने की प्रार्थना की, परंतु मूर्ति ने दूध नहीं पीया। बालक नामदेव के लिए वो मूर्ति नहीं, बल्कि साक्षात पांडुरंग थे। जो रूठकर दूध नहीं पी रहे थे। प्रतिदिन इसी प्रकार दूध मूर्ति के आगे रखते और विनय करते कि हे बिठ्ठल भगवान! दूध पी लो। चौथे दिन बेहाल बालक ने दूध गर्म किया और दूध मूर्ति के सामने रखा और कमजोरी के कारण चक्कर खाकर गिर गया। फिर बैठे-बैठे अर्जी लगाने लगा तो उसी समय मूर्ति के हाथ आगे बढ़े और कटोरा उठाया। सब दूध पी लिया। नामदेव जी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। फिर स्वयं भी खाना खाया, दूध पीया। फिर तो प्रतिदिन बिठ्ठल भगवान जी दूध पीने लगे।
माता-पिता तो पागल से हो गये। गली में जाकर कहने लगे कि नामदेव ने बिठ्ठल भगवान की मूर्ति को सचमुच दूध पिला दिया। यह बात सारे गाँव में आग की तरह फैल गई, परंतु किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। बात पंचों के पास पहुँच गई कि नामदेव का पिता झूठ कह रहा है कि मेरे पुत्र नामदेव ने पत्थर की मूर्ति को दूध पिला दिया। पंचायत हुई। पंचों ने कहा कि यह भगवान बिठ्ठल जी की मूर्ति रखी है। यह दूध का कटोरा रखा है। हमारे सामने नामदेव दूध पिलाए तो मानेंगे अन्यथा आपको सह परिवार गाँव छोड़कर जाना होगा। उसी समय कटोरा बिठ्ठल जी ने हाथों में पकड़ा और मूर्ति सब दूध पी गई। पंचायत के व्यक्ति तथा दर्शक हैरान रह गए।
👉 एक बार संत नामदेव जी अपने गुरू संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज, के साथ भगवत चर्चा करते हुए यात्रा पर निकले। रास्ते में दोनों को प्यास लगी। पास एक सूखा कुआं था। संत ज्ञानेश्वर ने योग-सिद्धि से कुंए के भीतर जमीन में जाकर पानी पिया और नामदेवजी के लिए थोड़ा जल ऊपर लेकर आ गए। नामदेवजी ने वो जल नहीं पिया। वो बोले मेरे विट्ठल को क्या मेरी चिंता नहीं है! उसी क्षण कुआ जल से भर गया, फिर नामदेवजी ने जल पिया।
👉 एक बार नामदेवजी रोटी बना रहे थे। तभी एक कुत्ता आया और रोटियां उठाकर भाग गया। नामदेवजी घी का कटोरा हाथ में लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े भगवन! रोटियां रूखी हैं, अभी चुपड़ी नहीं हैं। मुझे घी लगाने दीजिए, फिर भोग लगाइए। तभी भगवान ने कुत्ते का रूप त्यागकर शंख-चक्र–गदा-पदम् धारण किए। नामदेवजी ने दिव्य चतुर्भुज रूप में भगवान का दर्शन किया। नामदेवजी की भक्ति बड़ी ही ऊंची थी, वो प्रत्येक वास्तु में भगवान को ही देखते थे l
🌷 अहंकार और भ्रमित बुद्धि कभी भी कण-कण में भगवान का दर्शन नहीं कर पाती। यदि कोई भक्ति करता है और मन में अभिमान भी रखता है तो उस पर परमेश्वर की कृपा वर्षा नहीं हो पाती। अक्सर हम देखते हैं कि लोग भगवान को पाने के लिए नहीं पूजते, बल्कि अपनी इच्छा पूर्ति के लिए भगवान को याद करते हैं। सच्चे, सरल और निष्कपट भाव से जब हम भगवान को भजते हैं, तब ही भगवत्कृपा हमारे भीतर उतर सकती है।🌷
🌷 जय श्री विट्ठलनाथजी की , Զเधे Զเधे जी , प्रेम से बोलो …राधे राधे🌷

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